
सहदेव माहौर
सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक को लेकर जो बात कही, वह सिर्फ कानून की टिप्पणी नहीं थी। वह उन लोगों की आवाज़ थी, जो सालों से चुपचाप दर्द सह रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि जब तक आरोपियों को ऐसी सजा नहीं मिलेगी जो उन्हें सच में दर्द का एहसास कराए, तब तक ऐसे अपराध रुकने वाले नहीं हैं। यह बात कड़वी ज़रूर है, लेकिन बिल्कुल सच है।
एसिड अटैक कोई अचानक हुआ गुस्सा नहीं होता। यह सोच-समझकर किया गया अपराध होता है। इसका मकसद किसी की जान लेना नहीं, बल्कि उसकी पूरी ज़िंदगी बिगाड़ देना होता है। एक पल में चेहरा जल जाता है, आंखें, कान, त्वचा सब बर्बाद हो जाते हैं। लेकिन उससे भी ज़्यादा टूटता है इंसान का हौसला। वह खुद को पहचान नहीं पाता, समाज में निकलने से डरने लगता है।
हम अकसर कहते हैं कि ‘कानून सबके लिए बराबर है’ या ‘आरोपी को सुधारने का मौका मिलना चाहिए।’ लेकिन क्या किसी ने कभी पीड़िता से पूछा कि उसे किस चीज़ की ज़रूरत है? क्या कोई सजा उसके खोए हुए सपने, उसकी पढ़ाई, नौकरी या शादी के मौके वापस ला सकती है? नहीं। फिर भी वही पीड़िता सालों तक अदालतों के चक्कर काटती रहती है।
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शाहीन मलिक की कहानी इस सच्चाई को साफ दिखती है। 26 साल की उम्र में उन पर एसिड अटैक हुआ। आज वे 42 साल की हैं और अब भी इंसाफ का इंतजार कर रही हैं। 16 साल तक केस लड़ने के बाद भी अगर आरोपी बरी हो जाएं, तो यह सिर्फ एक फैसले की बात नहीं रहती, यह पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा करता है। आखिर एक पीड़िता कब तक इंतजार करें?
देश में आज भी सैकड़ों एसिड अटैक के मामले अदालतों में अटके पड़े हैं। हर पेंडिंग केस के पीछे एक इंसान है, जो रोज़ दर्द के साथ जी रहा है। इलाज का खर्च बहुत ज्यादा होता है। कई बार परिवार सब कुछ बेच देता है। नौकरी मिलना मुश्किल हो जाता है और समाज अक्सर मदद करने की जगह दूरी बना लेता है।
सरकार मुआवजे की बात करती है, योजनाएं बनती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अलग होती है। पैसा ज़रूरी है, पर सिर्फ पैसा काफी नहीं। ज़रूरत है तेज़ और सख्त न्याय की। ज़रूरत है कि एसिड जैसी चीज़ें आसानी से न मिलें। ज़रूरत है कि दोषी को यह एहसास हो कि उसने जो किया है, उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।
सुप्रीम कोर्ट का यह कहना सही है कि ऐसे मामलों में नरमी की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। क्योंकि यहां गलती सुधारने की नहीं, बल्कि जिंदगी बर्बाद करने की होती है। जब सजा सख्त होगी, तभी डर पैदा होगा और तभी ऐसे अपराध कम होंगे। अब सवाल हम सब से है। क्या हम हर बार कुछ दिनों तक खबर पढ़कर दुख जताएंगे और फिर भूल जाएंगे? या फिर सच में यह मानेंगे कि एसिड अटैक सिर्फ कानून की नहीं, हमारी सोच की भी बीमारी है जब तक अपराधी के लिए सहानुभूति और पीड़िता के लिए इंतजार बना रहेगा, तब तक कुछ नहीं बदलेगा। इंसाफ का मतलब सिर्फ फैसला नहीं होता, इंसाफ का मतलब है पीड़िता को यह महसूस कराना कि वह अकेली नहीं है। अब वक्त है कि हम सिर्फ सुनें नहीं, बल्कि समझें। और समझकर बदलाव की मांग करें।
