मानवता शर्मसार, ठेके पर महिला का शव ले गया परिवार
फरीदाबाद। इंसान चाहे तरक्की की नित-नई बुलंदियों को छू रहा हो, लेकिन इस चकाचौंध में मानवता और इंसानियत निरंतर पीछे छूटती जा रही है। ऐसा ही एक मामला फरीदाबाद के जिला सिविल अस्पताल बादशाह खान में देखने को मिला, जहां जिंदगी से जंग हारी एक महिला के शव को एंबुलेंस तक नसीब नहीं हुई, मजबूरीवश मृतका का परिवार उसके शव को ठेके पर लेकर जाने को मजबूर हो गया। इस घटना ने एक बार फिर सरकारी अस्पताल के बड़े-बड़े दावों को पूरी तरह से झूठला दिया। दरअसल सिविल अस्पताल में टीबी की बीमारी से ग्रसित 35 वर्षीय महिला सुमित्रा की बुधवार दोपहर मौत हो गई थी।
मौत के बाद जब शव को घर ले जाने की बारी आई तो अस्पताल से महज सात किलोमीटर दूर सारण गांव तक शव पहुंचाने के लिए भी परिवार को सरकारी एंबुलेंस नहीं मिल सकी। जबकि यह सेवा पूरी तरह निशुल्क है। बाद में मृतका के परिजन महिला के शव को ठेले पर रखकर ले गए। मृतका के पति गुनगुन ने बताया कि उनकी पत्नी पिछले तीन महीने से टीबी से पीडि़त थी और उसका इलाज लगातार सिविल अस्पताल में चल रहा था। हालत बिगडऩे पर कई बार उन्हें दिल्ली के सफदरजंग और एम्स जैसे बड़े अस्पतालों में रेफर किया गया, लेकिन कहीं भी समय पर और सही इलाज नहीं मिला। इलाज के नाम पर परिवार 3 से 4 लाख रुपये तक खर्च कर चुका था।
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जब पैसे खत्म हो गए तो मजबूरी में पत्नी को दोबारा सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां एक हफ्ते बाद उसकी मौत हो गई। गुनगुन ने बताया कि मौत के बाद डॉक्टरों ने शव घर ले जाने को कह दिया और अस्पताल कर्मियों ने एंबुलेंस की जानकारी दी। लेकिन एंबुलेंस विभाग में पूछताछ करने पर जवाब मिला कि अस्पताल परिसर में एक भी सरकारी एंबुलेंस उपलब्ध नहीं है। प्राइवेट एंबुलेंस वालों ने मात्र 7 किलोमीटर के लिए 500 से 700 रुपये की मांग की, जो एक दिहाड़ी मजदूर के लिए उस वक्त नामुमकिन थी।
आखिरकार, जिस ठेले से गुनगुन रोजी-रोटी कमाता है, उसी ठेले पर पत्नी का शव रखकर परिवार को अस्पताल से निकलना पड़ा। करीब डेढ़ घंटे तक अस्पताल परिसर में एंबुलेंस का इंतजार किया गया था, लेकिन सिस्टम पत्थर दिल बना रहा। इस दौरान 8 साल का मासूम बेटा भी अपने पिता के साथ मौजूद था। गुनगुन ने बताया कि वह मूल रूप से बिहार का रहने वाला है और फरीदाबाद के सारण गांव में किराए पर रहता है। दिहाड़ी मजदूरी से परिवार का गुजारा चलता है। पत्नी के इलाज में जो थोड़ी-बहुत पूंजी थी, वह पूरी तरह खत्म हो चुकी है। अब दाह संस्कार के लिए भी उन्हें दूसरों से कर्ज लेना पड़ेगा।
