आरटीई के बारे में उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद हरियाणा सरकार सख्ती से लागू करे आरटीई कानून

फरीदाबाद । सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 की धारा 12(1)(c) की व्याख्या करते हुए कहा कि संबंधित राज्य सरकारों और स्थानीय अधिकारियों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि समाज के कमज़ोर और वंचित वर्गों के स्टूडडेंट्स को आस-पड़ोस के स्कूलों में एडमिशन देने से मना न किया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि आस-पड़ोस के स्कूलों की भी यह समान ज़िम्मेदारी है कि वे RTE Act और संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत अनिवार्य रूप से 25% छात्रों को एडमिशन दें।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की बेंच ने कहा है कि राज्य सरकारों द्वारा RTE के
अधिनियम की धारा 12 के तहत कक्षा की कुल संख्या के 25% तक समाज के कमज़ोर और वंचित वर्गों के बच्चों को आस-पड़ोस के स्कूलों में दाखिला दिलाना और स्कूलों द्वारा दाखिला देना अनिवार्य किया गया है अतः इस जिम्मेदारी का ईमानदारी से पालन होना चाहिए।

हरियाणा अभिभावक एकता मंच ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री व शिक्षामंत्री से मांग की है कि हरियाणा में आरटीई कानून के सभी प्रावधानों व नियमों को सख्ती से लागू किया जाए,आरटीई दाखिला प्रक्रिया सरल बनाई जाए,नये शिक्षा सत्र में दाखिले के लिए नोटिफिकेशन जनवरी-फरवरी महीने में जारी किया जाए और जो प्राइवेट स्कूल आरटीई कानून के तहत बच्चों को दाखिला देने से मना करता है उसकी मान्यता रद्द की जाए।

मंच के प्रदेश महासचिव कैलाश शर्मा व प्रदेश लीगल एडवाइजर एडवोकेट बीएस बिरदी ने कहा है कि हरियाणा सरकार प्राइवेट स्कूल संचालकों को फायदा पहुंचाने की नीयत से नये शिक्षा सत्र के लिए आरटीई की दाखिला प्रक्रिया मार्च,अप्रैल में शुरू करती है तब तक स्कूलों में प्राइमरी लेवल में दाखिले हो चुके होते हैं दूसरा जो स्कूल खासकर सीबीएसई वाले आरटीई के तहत दाखिला देने से मना करते हैं उनके खिलाफ कोई भी उचित कठोर कार्रवाई नहीं की जाती है इसी के चलते स्कूल संचालक आरटीई कानून को गंभीरता से नहीं लेते हैं।

मंच के प्रदेश अध्यक्ष एडवोकेट ओपी शर्मा व प्रदेश संरक्षक सुभाष लांबा ने कहा है कि सरकार ने शिक्षा सत्र 2025 -26 में RTE का नोटिफिकेशन अप्रेल में जारी किया,दाखिला प्रक्रिया जून तक रखी। तब तक स्कूलों में प्राइमरी लेवल में दाखिले हो चुके थे और पढाई भी शुरु हो गई थी। मंच का आरोप है कि शिक्षा निदेशक ने उन 27 सीबीएसई के स्कूलों के खिलाफ कोई भी उचित कार्रवाई नहीं की है जिन्होंने शिक्षासत्र 2025-26 में RTE के तहत गरीब बच्चों को दाखिला देने से मना कर दिया था और जिनके बारे में जिला शिक्षा अधिकारी ने शिक्षा निदेशक को दो पत्र भेजकर इन दोषी स्कूलों की मान्यता रद्द करने की सिफारिश की थी।

मंच के राष्ट्रीय सलाहकार व सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट अशोक अग्रवाल ने शिक्षा सचिव व शिक्षा निदेशक को पत्र व लीगल नोटिस भेज कर जानकारी मांगी है कि शिक्षा विभाग ने जिला शिक्षा अधिकारी की सिफारिश पर इन 27 स्कूलों के खिलाफ क्या उचित कार्रवाई की है? कैलाश शर्मा ने कहा है कि 2 महीने हो गए हैं शिक्षा विभाग की ओर से कोई भी जानकारी नहीं दी गई है। अशोक अग्रवाल अब पंजाब एन्ड हरियाणा हाई कोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं।

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