फरीदाबाद। फरीदाबाद में असुरक्षित खून चढ़ाए जाने से दो बच्चे एचआईवी संक्रमित हो गए। दोनों थैलेसीमिया से पीडि़त थे और रूटीन ब्लड चढ़ाने आए थे। प्राथमिक स्तर पर आशंका जताई जा रही है कि रक्तदान के दौरान डोनर संक्रमण के ‘विंडो पीरियड’ में रहा हो सकता है। इस अवधि में सामान्य जांच से एचआईवी का पता नहीं चल पाता। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रचलित एलाइजा जांच में एंटीबॉडी की पहचान की जाती है, जबकि संक्रमण के शुरुआती चरण में एंटीबॉडी विकसित होने में समय लगता है। मामला सामने आने पर इसकी शिकायत पीएम ऑफिस में की गई। जिसके बाद इस पर संज्ञान लिया गया और संबंधित एजेंसियों को जांच के निर्देश दिए गए हैं। थैलेसीमिया मरीजों के लिए काम करने वाली संस्था ‘फाउंडेशन अगेंस्ट थैलेसीमिया’ के महासचिव रविंद्र डुडेजा ने मामले को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुए पीएमओ ऑफिस में शिकायत दर्ज कराई।
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शिकायत पर संज्ञान लेते हुए संबंधित एजेंसियों को जांच के निर्देश दिए गए हैं। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) और राज्य के औषधि नियंत्रण विभाग की टीमें यह पता लगाने में जुटी हैं कि रक्त जांच या आपूर्ति की प्रक्रिया में चूक कहां हुई। स्वास्थ्य विभाग फरीदाबाद के सीएमओ जयंत आहूजा ने कहा कि हमारे यंहा से ब्लड नहीं लिया गया है। हो सकता है बाहर किसी ब्लड बैंक से ब्लड लिया गया हो। वहीं, वरिष्ठ औषधि नियंत्रण अधिकारी कृष्ण कुमार गर्ग ने बताया मामले की जांच अभी चल रही है। अधिक कुछ नहीं कह सकते। सामाजिक संगठनों का कहना है कि सभी ब्लड बैंकों में अत्याधुनिक जांच प्रणाली, खासकर नेट टेस्टिंग, अनिवार्य की जानी चाहिए।
साथ ही ब्लड की गुणवत्ता की पारदर्शी निगरानी और लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। थैलेसीमिया एक खून की बीमारी होती है। जिसमें शरीर पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता। हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाने वाला वह प्रोटीन है, जो शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है। इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति को बार-बार खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ सकती है, क्योंकि उसके शरीर में स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएं जल्दी नष्ट हो जाती हैं। थैलेसीमिया माता-पिता से बच्चों में जीन के माध्यम से फैलता है और इसके प्रमुख प्रकार माइनर व मेजर होते हैं। समय पर जांच और नियमित उपचार से मरीज सामान्य जीवन जी सकता है।
